मैं सही तुम गलत
मैं सही हूँ या वो गलत? – अहंकार और रिश्तों की उलझन
लेखक: पंकज कुमार मिश्रा
“मैं सही हूँ, वो गलत है…
या वो सही है, और मैं ही गलत हूँ?”
ज़िंदगी अक्सर इन्हीं सवालों के बीच उलझी रह जाती है।
कभी रिश्तों में, कभी बहसों में, तो कभी अपने ही भीतर।
समस्या यह नहीं है कि गलती किसकी है,
समस्या यह है कि कोई खुद को गलत मानने को तैयार नहीं होता।
अहंकार की दीवार
इंसान की सबसे बड़ी कमजोरी शायद उसका अहंकार (Ego) है।
हम जानते हैं कि कहीं न कहीं हम गलत हैं,
फिर भी मानने से डरते हैं।
डरते हैं कि—
लोग क्या कहेंगे?
मैं छोटा हो जाऊँगा?
मेरी इज़्ज़त कम हो जाएगी?
और इसी डर में हम रिश्तों के बीच एक ऊँची दीवार खड़ी कर लेते हैं।
गलती मानना कमजोरी नहीं, समझदारी है
सच तो यह है कि
गलती मान लेना हार नहीं होती, बल्कि समझदारी की जीत होती है।
जिस रिश्ते में कोई एक कह दे—
“हाँ, मुझसे गलती हो गई”
वहीं से रिश्ता टूटने के बजाय संभलने लगता है।
पर अफ़सोस,
हम सही साबित होने की जंग में
अपने ही लोगों को खो देते हैं।
रिश्ते तर्क से नहीं, समझ से चलते हैं
हर रिश्ता कोर्ट केस नहीं होता
जहाँ फैसला सुनाना ज़रूरी हो।
कई बार—
चुप रह जाना,
माफ़ी माँग लेना,
या सामने वाले की बात समझ लेना—
रिश्ते को बचा लेता है।
लेकिन हमारा अहंकार कहता है—
“पहले वो माने, फिर मैं।”
और यहीं से दूरी बढ़ने लगती है।
अगर लोग गलती मान लें तो…
सोचिए कितना अच्छा होता अगर—
पति-पत्नी ego छोड़ देते
दोस्त एक-दूसरे को समझ लेते
परिवार में “मैं” से ज़्यादा “हम” होता
तो कितनी लड़ाइयाँ खत्म हो जातीं,
कितनी गलतफ़हमियाँ सुलझ जातीं,
और कितने रिश्ते बच जाते।
अंत में एक सवाल
क्या सच में सही होना ज़रूरी है?
या रिश्ते को सही रखना ज़्यादा ज़रूरी है?
शायद ज़िंदगी तब आसान हो जाए
जब हम यह कह सकें—
“हो सकता है मैं पूरी तरह सही न हूँ।”
क्योंकि
जहाँ अहंकार झुकता है,

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