कुछ छूट जाने की जद्दोजहद
हर सुबह एक नई उम्मीद लेकर आती है, लेकिन अक्सर उसकी शुरुआत एक अंतहीन भागदौड़ से होती है। आँख खुलते ही दिमाग में कामों की लंबी फेहरिस्त घूमने लगती है – दफ़्तर के असाइनमेंट, घर के काम, बच्चों की स्कूल बस, बिलों का भुगतान। हम पूरे दिन इसी कोशिश में लगे रहते हैं कि सब कुछ पूरा कर लें, कुछ भी छूट न जाए।
लेकिन फिर भी, शाम होते-होते एक अजीब सी कसक रह जाती है। कुछ न कुछ तो छूट ही जाता है। शायद वो बच्चों के साथ बिताया जाने वाला अनमोल पल, परिवार के साथ एक सुकून भरा भोजन, या खुद के लिए निकाला गया थोड़ा सा वक्त।
यह दौड़ किस लिए है? क्या पाने के लिए? इस पाने की होड़ में, हम अक्सर खुद को ही बहुत पीछे छोड़ आते हैं। वो अपनी पसंद का खाना, वो दोस्तों और रिश्तेदारों से दिल खोलकर की गई बातें, वो बेफिक्री के पल – सब कहीं खो से गए हैं।
क्या हम इतने व्यस्त हो गए हैं कि जीना ही भूल गए हैं? क्या हम इतना कुछ पाने की कोशिश में हैं कि जो हमारे पास है, उसे महसूस करना ही छोड़ दिया है?
कभी-कभी रुककर सोचने की ज़रूरत है। यह समझने की ज़रूरत है कि असली दौलत पैसे और सफलता में नहीं, बल्कि उन छोटे-छोटे पलों में है जो हम अपने प्रियजनों के साथ बिताते हैं, उन रिश्तों में है जिनकी हम परवाह करते हैं, और उस सुकून में है जो हम अपने भीतर पाते हैं।
शायद अब समय आ गया है कि हम इस अंतहीन भागदौड़ से थोड़ा थम कर, उन चीज़ों को थाम लें जो सचमुच मायने रखती हैं। कहीं ऐसा न हो कि सब कुछ पाने की ज़िद में, हम खुद को ही गंवा बैठें।
आइए, आज से थोड़ा रुकें, साँस लें, और उन पलों को जिएँ जो हम अक्सर छूट जाने देते हैं।

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